इस तरह खुद को सताते क्यूँ हैं
प्यार करते हैं, छुपाते क्यूँ हैं
कितने पहलू हैं जिंदगानी के
हम शिकन माथ पे लाते क्यूँ हैं
चलिए जाने भी उन्हें दीजे अब
बीते लम्हों को बुलाते क्यूँ हैं
लोग घर-बार की निजी बातें
यूँ सरेआम सुनाते क्यूँ हैं
अंत में आँख छलक आती है
आप इतना भी हंसाते क्यूँ हैं