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सोमवार, 30 अप्रैल 2012

अमर कर दूँ तुझे कुछ इस तरह मैं....

एक ताज़ा ग़ज़ल हुई है.मुलाहज़ा करें..

किया करता हूँ ख़ुद से ही ज़िरह मैं 
पशेमां किसलिए हूँ इस तरह मैं

लगे ख़्वाबों के पंछी फिर चहकने 
करूँ कैसे उन्हें फिर से ज़िबह मैं 

लिखो गर लिख सको तो हर्फे रौशन 
वरक उजला नहीं हूँ,हूँ सियह मैं

झिझक से तुम जो अपने आओ बाहर
तो दिल की खोल दूँ इक-इक गिरह मैं

मुझे कोसेंगी मेरे बाद नस्लें 
उजाला तीरगी को दूँ तो कह मैं

करूँ ऐसा कि ग़म में  डूब जाऊं 
तभी तो पाउँगा फिर इसकी तह मैं

तुझे पहनाऊं पैराहन ग़ज़ल का 
अमर कर डालूं तुझको इस तरह मैं.

पशेमां- शर्मिंदा
ज़िबह-गला रेतना
हर्फे-रौशन- चमकदार अक्षर
वरक- पृष्ठ
नस्लें-पीढियां
सियह- काला
तीरगी- अँधेरा  
पैराहन- वस्त्र  

सोमवार, 26 मार्च 2012

आजकल

जैसे एक टुकड़ा हो धूप का
भटक रहा हो अरसे से
ढूंढ रहा हो
मेरे घर की खिड़कियाँ

एक पत्ता हो टूटा हुआ
जिस पर कूट भाषा में लिखा हो सन्देश
कूट भाषा जिसे सिर्फ मैं पढ़ सकूँ

हवा का बेठौर झोंका हो जैसे कोई
जिसमे समाईं हों
पानी की बारीक बूँदें
मेरे बदन का पसीना नागवार हो जिसे

जैसे एक महक हो बौराई हुई सी
जो हाथ धो कर मेरे पीछे पड़ी हो.

शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

वह...

वह परेशानियों में घिरा और
फिक्र में डूबा हुआ तो था ही
बीमार भी रहने लगा था
सुबहें उसे किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह
आ धमकीं लगतीं
जिसके पास वक्त ही वक्त होता
और जो यह मान बैठा होता कि
हर कोई उसी की तरह खाली है
उन्हें बर्दाश्त करते हुए वह सोचता जाता
हाय ये औपचारिकता के तकाजे

दिन उसकी छाती पर
'अफारे' की तरह चढ़ बैठता
और फूलती साँसों का एक भी कतरा
उसे अपना  नहीं लगता

हाँ स्याह शब् के बेरंग दरीचे
जरूर उसे भाते थे
उसे नींद कम ही आती
पर वह आँखें मूँद कर लेटा होता
कि बरबस एक स्त्री उसे गुदगुदी करने लग जाती
पहले वह खीजता फिर पूछ ही बैठता
आखिर क्या अहसास कराने पर तुली हो तुम मुझे?
उसे पता होता की बिना बात पर 
हँसने  वाली यह स्त्री
अभी-अभी रसोई से रो कर निकली है

और वह बच्चा
जो अब  उसके अनमनेपन से ख़ासा वाकिफ होता
स्त्री बच्चे के नन्हे पैरों में मोज़े डालती 
और साथ में रट लगाती जाती-
'पापा झूठे ,पापा झूठे...'
बच्चा भी   एकदम से उछलकर
उस पर नन्हें मुक्के बरसाने लगता 
 'अफारा' उसकी छाती से एक लम्बी
फुस्स के साथ चुपके से निकल जाता
वह बुदबुदाता...
इतनी बुरी  भी नहीं है ज़िन्दगी..


बुधवार, 24 अगस्त 2011

काला या सफ़ेद

कुछ  सफ़ेद था 
जो काला पड़ रहा था
कुछ   सफ़ेद
देर तक देखे जाने के बाद
काला सा लगता था
कुछ काला सफ़ेद किया जा रहा था
कुछ को सफ़ेद कहा जा रहा था
कुछ ऐसा काला था
जिसमे अचानक सफ़ेद चमक पड़ता था
काले और सफ़ेद ने मिलकर
एक धुंध रच दिया था
जिसमे सारे रंग खो गए थे . 

बृहस्पतिवार, 14 जुलाई 2011

ठहरना

किन्हीं बैलों के कन्धों पर
ठहरा होगा भादो का महीना
कुछ वाक्य ठहर गए होंगे
किसी राजकवि की कलम की नोक पर
किन्ही निराश प्रेमियों के ख्यालों में
ठहर गई होगी अँधेरी रात की कोई निर्जन बेला
माशा भर काजल
बुढाती हुई माँ की उँगलियों पर ठहर कर काँप रहा होगा



अस्पताल में भर्ती मरीजों की स्मृतियों में
ठहरा होगा सूर्योदय का दृश्य
सीमा पर तैनात किसी फौजी के कानों में
तोतले बोल ठहर गए होंगे
किन्ही सेवानिवृत बुजुर्गों के जेहन में ठहरा होगा
नौकरी का पहला दिन
किसी कैदी की पथराई आँखों में
नीले आसमान का कोई टुकड़ा ठहर कर रह गया होगा



किसी बेरोजगार लड़के के भारी क़दमों में
ठहरी होगी कोई फुटबाल
ठहरा सा होगा भंडारे में खाए हलवे का स्वाद
किसी भिखारी की जीभ पर
किसी कूड़ा बीनने वाले बच्चे के मैले हाथों में
अचानक से ठहर गई होगी कोई फुलझरी
हमेशा के लिए ठहर गई होगी बारूद की गंध
किसी अपाहिज फेरी वाले के नथुनों में



किन्हीं मजदूरनियों के रूखे बालो की जड़ो में
ठहर कर बैठा होगा चिपचिपाता पसीना
प्रसव पीड़ा किसी वेश्या की कमर में ठहरी होगी
किसी नौजवान विधवा के गले में
करवा चौथ की प्यास ठहर गई होगी
आते-आते ठहर गए होंगे कुछ सवाल
किन्हीं बड़ी होती बच्चियों के स्निग्ध होठों पर.

सोमवार, 4 जुलाई 2011

शिमला

सुरंग,टॉय ट्रेन के
धुंध भरी रेन के
रिट्ज़ और माल के
कुली नब्बे साल के
चीड़,देवदार के
लक्कड़ बाज़ार के
छः जन के अमले के
सौ घंटे शिमले के

'चाँद' की चाय के
'ग्रैंड' की सराय के
भुट्टों के,घोड़ों के
पनीर के पकोड़ों के
काफी हाउस,डोसों के
दोपहर के ओसों के
डालिया के गमले के
सौ घंटे शिमले के

जून में रजाई के
घाटियों के,खाई के
सतलज के तट पर के
गर्म कुंड सल्फर के
साथ तत्तापानी के
पहाड़ों की रानी के
और ड्राईवर कमले के
सौ घंटे शिमले के

भींगी,भींगी रातों के
टोपियों के,छातों के
चढ़ाई के,ढलान के
तिकोनिया मकान के
लौज वाइसरीगल के
जाखू के जंगल के
बंदरों के हमले के
सौ घंटे शिमले के

शुक्रवार, 3 जून 2011

ग़ज़ल

हमें दूर से पता चल गया केवल उसकी चाल से
बिटिया पहली बार आई है माँ के घर ससुराल से

किसिम-किसिम के पंख बांध कर लाख हवा में उड़ लें हम
रिश्ता टूट नहीं सकता मिट्टी का कभी हमारी खाल से

कमजर्फों से हमदर्दी की हम उम्मीदें पालें क्यूँ
जैसे चंदा मांग रहे हों आप किसी कंगाल से

हम भी उस दिन तुम पर चन्दन,अक्षत,पुष्प चढ़ाएंगे
जिस दिन फुर्सत मिल जाएगी हमको रोटी-दाल से

मछली बन कर पानी में उतरा ही क्यों था ये बतला 
गर तू इतना खौफज़दा है मछुआरे की जाल से

आज तलक तो तलवारों की कभी जरूरत पड़ी नहीं
हम लड़ाई लड़ते आये हैं फकत अकेली ढाल से

ये बच्चे कितना हैरां करते हैं बातों-बातों में
मन अक्सर घबरा जाता है उनके किसी सवाल से