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बुधवार, 8 सितंबर 2010

ग़ज़ल

वक़्त अपने बही-खाते खोल कर फुर्सत वसूले
इस तरह या उस तरह से ज़िन्दगी कीमत वसूले

आसमां,धरती,बगीचे,हवा,पानी का किराया
आदमी से सांस लेने की  रकम कुदरत वसूले

आपको जनतंत्र में दो जून की रोटी मिलेगी
मगर बदले में सियासत आपकी अस्मत वसूले

दुश्मनी तो दुश्मनी थी,क्या था हासिल दोस्ती का
जिल्लतें,शिकवे-गिले,रुसवाइयाँ  ,तोहमत वसूले

शौक से हम बाँट लेंगे आप सबका अनमनापन
कोई हमसे भी हमारी कुछ बुरी आदत वसूले

आइये हम फूंक दे ये कान में बच्चों के अपने
आदमी जो चाह ले तकदीर से किस्मत वसूले 

7 टिप्‍पणियां:

  1. ::शौक से हम बाँट लेंगे आप सबका अनमनापन
    कोई हमसे भी हमारी कुछ बुरी आदत वसूले ::
    ए़क और सुंदर ग़ज़ल.. अंतिम शेर बहुत उम्दा.. बहुत इन्तजार करना पड़ता है आपकी ताज़ा ग़ज़ल के लिए..

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  2. आपके ब्‍लाग पर आकर अच्‍छा लगा। आपकी रचनाएं भी।

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  3. बहुत बढ़िया शेखर जी ...........एक बेहतरीन ग़ज़ल ........सही बात है आजकल हर कोई वसूलने में ही लगा हुआ है|

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  4. आपको जनतंत्र में दो जून की रोटी मिलेगी
    मगर बदले में सियासत आपकी अस्मत वसूले

    आहा!! क्या चोट की है

    शौक से हम बाँट लेंगे आप सबका अनमनापन
    कोई हमसे भी हमारी कुछ बुरी आदत वसूले
    बेहतरीन..बेहतरीन ...बेहतरीन....
    ढेर सारी दाद कबूलें
    ब्रह्माण्ड

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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