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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

ग़ज़ल

न रोना ,मुस्कुराना चाहता है
खलिश दिल में दबाना चाहता है

पिता के व्यंग्य  से आहत बहुत है
वो अब कुछ कर दिखाना चाहता है

रुपय्या सूद पर ले कर चला है
शहर जा कर कमाना चाहता है

सितारों की कोई चाहत नहीं है
मुनासिब  मेहनताना चाहता है

जरुरी है नहीं बुजदिल ही होगा
ये मुमकिन है भुलाना चाहता है

3 टिप्‍पणियां:

  1. पिता के व्यंग से आहत बहुत है
    वो अब कुछ कर दिखाना चाहता है.... unemployment ki samasya se jujhte yuva varg ki manodasha ka achchha chitran......shubhkamna......

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  2. ख़ूबसूरत ग़ज़ल....आपने एक नौजवान की समस्याओं का बखूबी हाल बयां किया है ....ऐसे ही लिखते रहिये ....कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयें.........

    http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
    http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
    http://khaleelzibran.blogspot.com/

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  3. umda rachna hai, ye gazal gehrahi aur bepaki ka sunder mishran hai

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