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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

ग़ज़ल

इस तरह खुद को सताते क्यूँ हैं
प्यार करते हैं, छुपाते क्यूँ हैं

कितने पहलू हैं जिंदगानी के
हम शिकन माथ पे लाते क्यूँ हैं

चलिए जाने भी उन्हें दीजे अब
बीते लम्हों को बुलाते क्यूँ हैं

लोग घर-बार की निजी बातें
यूँ सरेआम सुनाते क्यूँ हैं

अंत में आँख छलक आती है
आप इतना भी हंसाते क्यूँ हैं  

6 टिप्‍पणियां:

  1. अंत में आँख छलक आती है
    आप इतना भी हंसाते क्यूँ हैं खुबसूरत शेर बधाई

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  2. ख़ूबसूरत ग़ज़ल....हर ग़ज़ल का टाइटल ग़ज़ल न रखें|

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  3. ए़क अलग भाव की ग़ज़ल ...हर शेर उम्दा है ... इमरान भाई से सहमत हूँ की हर ग़ज़ल का शीर्षक ग़ज़ल न रखें .. या फिर कहीं ऐसा तो नहीं की ग़ज़ल का कोई शीर्षक ही ना होता हो..

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  4. सौरभ शेखर जी ,
    नमस्कार !
    आपके यहां पहली बार पहुंच पाया हूं …
    आ'कर अच्छा लगा । टिप्पणी बेशक इस ग़ज़ल पर लिख रहा हूं , लेकिन आपकी बाकी तमाम ग़ज़लें भी पढ़ी हैं ,
    अच्छा लिख रहे हैं ।

    शस्वरं पर आपका हार्दिक स्वागत है , अवश्य आइएगा …

    शुभकामनाओं सहित …

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  5. कितने पहलू हैं जिंदगानी के
    हम शिकन माथ पे लाते क्यूँ हैं-Shekhar,kya baat kahi mere shayar.chah kar bhi beete dino ko bhula paya hai kaun? Lajawab prastuti ke liye dhanywad.

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