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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ग़ज़ल

बहुत लम्बी लड़ाई लड़ रहा है
क्यूँ अपनी जग हँसाई कर रहा है

वो उन गलियों को कैसे भूल जाये
उन्ही गलियों में उसका घर रहा है

इबादतगाह,गिरिजाघर,शिवालय
मगर होना है जो होकर रहा है

मै दुनिया से हूँ या दुनिया है मुझसे
भरम मन में मेरे अक्सर रहा है

मुकद्दर में भले सहरा लिखा है
कोई साया है जो सर पर रहा है

तजुर्बे का तकाजा तो यही  है
सबेरा शाम से बेहतर रहा है

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