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बुधवार, 11 अगस्त 2010

ग़ज़ल

ख्वाब बन कर दिलों में रहते हैं
कुछ सफ़र मंजिलों में रहते हैं

तन बहुत पास-पास हों,पर मन
बारहा फ़ासलों में रहते हैं

खौफ खाते हैं खुद के साये से
लोग जो महफ़िलों में रहते हैं

हर नए मोड़ पर नए रिश्ते
वक़्त के सिलसिलों में रहते हैं

यूँ मुहब्बत है तेरी आँखों में
जैसे जल बादलों में रहते हैं

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह. बहुत उम्दा गज़ल.
    मतला को कमाल का है.

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  2. बहुत खूब सौरभ जी खुबसूरत ग़ज़ल है|

    "तन बहुत पास-पास हों,पर मन
    बारहा फ़ासलों में रहते हैं"

    ये लाइन बहुत अच्छी लगी|

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  3. "यूँ मुहब्बत है तेरी आँखों में
    जैसे जल बादलों में रहते हैं"
    क्या बिम्ब बनाया है ! लाजवाब !

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  4. राहुल राजेश13 अगस्त 2010 को 5:28 pm

    दोस्त,
    तुम्हारी गज़लें पढ़ी।
    कुछ तो पहले भी सुनी थी तुमसे ही।
    अच्छी बन पड़ी हैं।
    और पारदर्शी और झीनी बनो अपनी आवाज में।

    बिखरे बाल, तैंतीस वर्ष-2, देह, चाक, प्राण आदि कविताएँ अच्छी हैं।
    तैंतीस वर्ष-1 का अंत हताशाजनक है।
    प्रेम किसी भी उम्र में अभी अभी खिले फूल की तरह
    ताजा, खुशबू से लबरेज और जवान होता है।
    अगर ऐसा न होता तो ढलती उम्र में भी प्रेम की तपिश दिल में कायम न रहती ।
    प्रेम का स्वांग शायद बदसूरत होता हो, तब भी यह बदबूदार नहीं हो सकता।
    कुल मिलाकर कोई भी रिश्ता खराब या बदबूदार नहीं होता।
    हम उसे निभाने की तहजीब न बरत पाएं तो इसमें हमारी बदगुमानी है, बदनसीबी है।
    और हाँ, प्रेम हर उम्र में अपनी तरफ खींचता है।
    बचना हो तो बचो।
    वह तुम्हें हमेशा पुकारता है।
    सुनना हो तो सुनो।

    जो कहते हैं ना, वहाँ तो वह और भी आसानी से पहुँच जाता है!
    मुझे किसी अंग्रेजी कविता की एक पंक्ति कुछ कुछ याद आ रही है-
    I WROTE ON THE DOOR OF MY HEART:
    NO THOROUHFARE !
    LOVE CAME SAYING,
    I CAN ENTER EVERYWHERE!!

    शुभेच्छा ।

    राहुल राजेश

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  5. "ख्वाब बन कर दिलों में रहते हैं
    कुछ सफ़र मंजिलों में रहते हैं "
    Shekhar,
    kya kahein ham apki shayari ke kayal hain, chahte hain muskurana,par dil ke hathon ghayal hain.

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