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बुधवार, 11 अगस्त 2010

दूरियां

एक तो तुम भी बहुत दूर खड़े थे मुझसे
और आवाज़ मिरी कांपती थी वैसे ही
तुम अगर सुनते भी तो क्यूँ सुनते

नर्म,मासूम से जज्बात जुबाँ चाहते थे 
जर्द होठों पे इक जुंबिश के सिवा कुछ न हुआ 
थी खलिश सीने मे पैबस्त औ पैबस्त  रही


हौसला मैंने बहुत बार किया होगा पर
जाने पैरों में कहाँ से पड़ी ये जंजीरें
मै दो कदम भी चलता तो वहीँ गिर जाता


एक दीवार दरमियान रही झीनी सी
देख तो सकते थे हम पार  एक दूजे को
तोडना उसको मेरे वश में नहीं था या रब


हसरतें दिल में दबा ली इन्ही उम्मीदों पे
कल्ह जो चमकेगा चाँद पूनम का
मेरी किस्मत पे  मेहरबां होगा

चांदनी तीरगी को पी लेगी
मै भी खोये हुए अशआरों को
उस उजाले में ढूंढ़ लूँ शायद .

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiya !
    "एक दीवार दरमियान रही झीनी सी
    देख तो सकते थे हम पार एक दूजे को
    तोडना उसको मेरे वश में नहीं था या रब"
    ye pankitya bahut marmsparshi hain

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  2. राहुल राजेश, दुमका/धनबाद/दिल्ली/अहमदाबाद13 अगस्त 2010 को 4:24 pm

    दोस्त, बस आमीन ही कह सकता हूँ।
    आह या वाह
    दोनों ही नाकाफी !

    हरा रंग तेरे ब्लॉग के आसमां का दिल की आँखों को
    खूब भाया !
    इस पर कहीं कहीं सिंदूरी नारंगी गुलाबी नीला रंग भी थोड़ा उड़ेल दो
    तो कैसा हो !

    नज़्म वाकई सुंदर बनी है।
    दिल को मांजते रहो,आँखों को संवारते रहो।
    कलम ख़ुद ब ख़ुद पैनी और पानीदार हो जाएगी।

    अपनापा भरी शुभकामनाएँ।

    तुम्हारा
    राहुल।

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