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गुरुवार, 13 मई 2010

ग़ज़ल

दिल की चाहत जवान हो ली है 
ओह!आफत में जान हो ली है

तू निशाने पे है बिचारे दिल 
उनकी नजरें कमान हो ली है 

बात का जिक्र तक न था कोई 
बात खुद ही बयान हो ली है 

नींद आती नहीं है आँखों को 
हाय!कैसी थकान हो ली है 

धरती ओझल हुई है पंछी को 
कितनी ऊँची उड़ान हो ली है 

दिल की चाहत जवान हो ली है 
ओह!आफत में जान हो ली है

3 टिप्‍पणियां:

  1. eak din me , eak baar itni saari behteen gazalen... sach much ...
    दिल की चाहत जवान हो ली है
    ओह!आफत में जान हो ली है

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  2. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार
    धरती ओझल हुई है पंछी को
    कितनी ऊँची उड़ान हो ली है

    दिल की चाहत जवान हो ली है
    ओह!आफत में जान हो ली है
    बहुत खूबसूरती से मन के भाव उकेरे हैं

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  3. शेखर ,बेहतरीन गजल के लिये धन्यवाद ."दिल की चाहत जवान हो ली है ,ओह!आफत में जान हो ली है" भाव का बहाव शब्दो से निकलकर बाहर तक आ रहा है तक आ रहा है.सचमुच लाजवाब प्रस्तुती है .

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