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रविवार, 30 जनवरी 2011

ग़ज़ल

अस्पताल के लिए कतारें एक तरफ
मंहगी और चमकती कारें एक तरफ

साहिब कुत्तों को पुचकारें एक तरफ
पशुवत बचपन की दुत्कारें एक तरफ

एक तरफ कानून,प्रशासन,न्यायालय
वर्षों से अनसुनी गुहारें एक तरफ

एक तरफ निर्भय कातिल का विजय जुलूस
बेबस बेवा की चीत्कारें एक तरफ

एक तरफ डिस्को की थापें,रैम्प,शैम्प
कीचड़ में पावं फटकारें  एक तरफ

एक तरफ भूखी आँतों से उठती मितली
भरे पेट की उष्ण डकारें एक तरफ

एक तरफ घर-घर में है अनबूझ अबोला
सडको पर उन्मादी नारे  एक तरफ

एक तरफ बैठकखाना है सजा घास से 
पड़े हाशिये पर घसियारे एक तरफ 

एक तरफ कुल छः फुट की है बालकनी 
दरवाजे, छज्जे, ओसारे  एक  तरफ  

2 टिप्‍पणियां:

  1. सौरभ जी,

    इस ग़ज़ल के लिए हैट्स ऑफ टू यू........बहुत ही मार्मिकता के साथ आपने दो परस्पर विरोधी चीजों का खूबसूरती से इस्तेमाल किया है......बधाई आपको|

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  2. एक तरफ कानून,प्रशासन,न्यायालय
    वर्षों से अनसुनी गुहारें एक तरफ

    एक तरफ निर्भय कातिल का विजय जुलूस
    बेबस बेवा की चीत्कारें एक तरफ

    वाह...वाह...वाह...लाजवाब शायरी...
    नीरज

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