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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

ग़ज़ल

आज क्यों है घंटियों का शोर ये संलाप जैसा
क्या पुजारी पढ़ रहा है मंत्र भी चुपचाप जैसा

इन धुआंती भट्टियों में फेंक दो सब कागजात
बाद में शायद मिले कुछ अंगूठे की छाप जैसा

झुनझुना सा इक नरेगा,भूख का विस्तृत भूगोल
वंश का वरदान हो फिर क्यूँ नहीं अभिशाप जैसा

मैंने पूछा चोर का हुलिया बताओ तो कहा
मूंछ उसकी आप जैसी,रंग उसका आप जैसा

आंच पर पानी का बर्तन बन गई है ज़िन्दगी
खौलता विश्वास हरदम और रिश्ता भाप जैसा

4 टिप्‍पणियां:

  1. सौरभ जी आपकी यह ग़ज़ल खुल से आज के हालात को बया कर रही है..

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  2. "आंच पर पानी का बर्तन बन गई है ज़िन्दगी
    खौलता विश्वास हरदम और रिश्ता भाप जैसा"
    प्रिय सौरभ समय और समाज को जितने अच्छे से एक रचनाकार समझ सकता है,उतना शायद ही कोई और. वर्तमान समय में स्थितियां वाकई ऐसी ही हैं. गजल की सम्प्रेषणनीयता गजब की है.काफी समय बाद आ पाया हूँ.

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  3. सौरभ जी....शानदार अभिव्यक्ति है...

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  4. मैंने पूछा चोर का हुलिया बताओ तो कहा
    मूंछ उसकी आप जैसी,रंग उसका आप जैसा

    आंच पर पानी का बर्तन बन गई है ज़िन्दगी
    खौलता विश्वास हरदम और रिश्ता भाप जैसा

    इन दोनों शेरों पर भरपूर तालियाँ....वाह जी वाह...दाद कबूल करें...
    नीरज

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