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सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

प्रेम

लकड़ी का तो था नहीं प्रेम
जिसे किसी कुल्हाड़ी  या आग का डर हो
या जो समय की लहरों पर तिरता रहता
प्रेम चुम्बक था और ठोस लोहे का बना था
शायद इसीलिए समय कि लहरों में जब पड़ा तो डूब गया
हमें यह तो लगता था कि पड़ा होगा प्रेम कहीं तलहटी  में गहरे
लेकिन जंग लगा हुआ लोहा भी हो सकता था वह
फिर एक दिन मैंने पारदर्शी समय में गोता लगा ही दिया
मैंने देखा कि लोहे में जंग नहीं लगा है
वह तो किसी सीपी में बंद पड़े-पड़े दो मोतियों में ढल गया है
मै क्या करता?
 दोनों मोतियाँ निकाल लाया
और हौले से तुम्हारी हथेलियों में धर दिया
तुमने उनकी दो मालाएं बनाईं
एक मेरे गले में डाल
एक खुद पहन लीं
अब वहीँ लटक रहा है प्रेम का मोती
हमारे ह्रदय को छू  रहा है .

  

4 टिप्‍पणियां:

  1. सौरभ जी,

    वाह सौरभ जी.....क्या बात है प्रेम का अनछुआ पहलू .....बहुत सुन्दर|

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  2. कोमल भावों से सजी ..
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
    फुर्सत मिले तो 'आदत.. मुस्कुराने की' पर आकर नयी पोस्ट ज़रूर पढ़े .........धन्यवाद |

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