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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

शून्य

जानता हूँ कि इस शून्य से खुद को गुणा करूँ
तो स्वयं शून्य में तब्दील हो जाऊंगा
लेकिन आँखों की पुतलियों में शून्य जैसे जम सा गया है
और धीरे-धीरे पिघल कर
पलकों को बोझिल बना रहा है

शून्य के शक्ल की एक स्पंज की गेंद
लगता है कलेजे में ढब-ढब कर रही है
और किसी क्षण उछल कर
बाहर आना चाहती है

कान जो आवाजें सुन रहे हैं
वे भी दिमाग में पहुँच कर
शून्य का बुलबुला बन जा रहे हैं

शून्य तो मुझे बार-बार परे धकेल रहा है
मै हीं इस शून्य के भीतर चल कर
ना जाने कहाँ पंहुचना चाहता हूँ.
 

1 टिप्पणी:

  1. शून्य का सुन्दर विम्ब.. इसी शून्य से तो है जीवन.. बढ़िया कविता..

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