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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

नमकीन की रेहड़ी

उस रेहड़ी वाले से मैंने दस रुपये के नमकीन ही तो ख़रीदे थे.लेकिन खुले पैसे वापस करते हुए वह इस निश्चलता से हँसा कि हँसी उसके होठों की कोरों से निकलती हुई उसकी आँखों में जाकर ठहर गई.और ठहरी भी कहाँ?उसने मेरे दिलो-दिमाग को छुआ और मै सोंचने पर मजबूर हो गया.
मैं इस तरह आखिरी बार कब हँसा था?
ऐसा नहीं है कि मै हँसता नहीं हूँ. हँसता तो मै रोज हूँ, बीसियों बार.अपनी सोसाइटी में,दफ्तर में,राह चलते किसी परिचित के मिल जाने पर.मेरे होठ एक निश्चित मात्रा में फैलते हैं और यथास्थान  वापस आ जाते हैं लेकिन उस हँसी से मेरे दिल में तो दूर चेहरे तक में कोई स्पंदन नहीं होता .
इसके अलावा भी मै कई मौकों पर और कई बार हँसता रहा हूँ जैसे- दबी सी हँसी,कातरता की हँसी,'विनम्रता'की हँसी,ठकुरसुहाती हँसी,चिंता की हँसी,क्रोध की हँसी(मुन्ना भाई टाइप),झल्लाहट की हँसी,उकताहट की हँसी,खिसियाहट की हँसी,मिमियाहट की हँसी,अहम् की हँसी,लोलुप हँसी,हिकारत की हँसी,शर्मिंदगी की हँसी,दरिंदगी की हँसी .दूसरों की मुर्खता पर बाकायदा हँसता रहा हूँ मै .फूहड़ लतीफों पर भी हँसा हूँ ठहाके मार कर .जहाँ नहीं हँसना था वहां भी कई बार हँसा हूँ .एक-दो बार खुद पर भी हँसा होऊंगा इस दौरान .मगर आखिरी बार उस रेहड़ी वाले की माफिक कब हँसा था मै?सचमुच याद नहीं आता .
दरअसल ऐसी गतिमान हँसी हम तभी हंस सकते है जबकि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण सरल हो और हमने अपने आपको विभिन्न जायज और नाजायज समीकरणों में उलझा नहीं रखा हो.ऐसी हँसी हंस कर हम अपने परिवेश को जाने अनजाने और अधिक संवेदनशील,सहानुभूतिपरक  और करुणामय बना देते हैं.शायद यह कहना भी गलत नहीं है कि हम अपनी कविताओं,कहानियों,ग़ज़लों या किसी और कला की दुरूह साधना के जरिये जो लक्ष्य साधना चाहते है, ऐसी सरल हँसी उसका शार्ट-कट हो सकती है.   

3 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा है आपने.. अब हम हँसते ही कहाँ है...

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  2. हँसना एक कला है और इसे सीखना इतना आसान नहीं...लेकिन एक बार सीख लिया तो फिर जीवन भर आनंद रहता है...

    नीरज

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  3. आदमी की हंसी धीरे धीरे गायब होती जा रही है,परन्तु हँसना ज़रूरी है .

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